लेखनी प्रतियोगिता -29-Aug-2022 रसोई की खिड़की
शीर्षक = रसोई की खिड़की
दोपहर के बारह बज चुके थे। ज्यादातर घरों की रसोई से खाने बनाने की आवाज़े आ रही थी कही कूकर में सी टी आ रही थी तो कही से खाने की खुशबू आ रही थी ।
ऐसे ही रसोई की खिड़की के पास खाना बना रही सविता की नज़र बाहर खेल रही छोटी छोटी बच्चियों पर पड़ी जो रस्सी कूद, चार खाने, और भी ना जाने किस तरह के खेल रही थी और अपने बचपन के पलों का आनंद उठा रही थी।
यही कुछ साल होते है लड़कियों के पास जिनमे वो बिना किसी रोक टोक के अपनी आज़ादी के लम्हो को जी लेती है वरना तो जैसे जैसे वो बढ़ती जाती है घर की चारदीवारी के बीच कैद होती जाती है । और फिर कुछ दिनों बाद शादी के बाद पराये घर चली जाती है ।
वैसे तो सवीता हमेशा उन बच्चियों को डांट कर भगा देती थी । और वो बच्चीयां भी उसे कुछ ज्यादा पसंद नही करती थी क्यूंकि वो उन्हें हमेशा डांट लगाया करती थी और वहाँ खेलने से मना करती थी ।
और जब भी बात नही बनती तो खिड़की बंद कर देती। दरअसल उन 12 / 13 साल की बच्चियों को खेलता देख उसे गुस्सा आता और कभी कभी अपना बचपन भी याद आ जाता जो उससे छीन लिया गया था ।
गुड़िया गुड्डो से खेलने की उम्र में उसका गोना कर दिया गया था चंद पैसो के लालच में और वो दुल्हन बन कर अपने दूल्हा के घर आ गयी थी । जहाँ उसने कच्ची उम्र में ही घर धारी संभाल ली थी और कुछ साल बाद अपने पहले बच्चें को जन्म देकर वो एक माँ भी बन गयी थी ।
पढ़ने लिखने का बहुत शौक था उसे किन्तु घर के कामों से फुर्सत मिलती तब ही पढ़ाई लिखाई पर ध्यान देती कॉपी कलम की उम्र में ही तो उसके हाथो में घर की ज़िम्मेदारी थमा दी गयी थी ।
शायद यही वजह थी की वो बाहर खेलने वाली लड़कियों को देख उन्हें भगा देती थी जब भी वो रसोई में काम के दौरान रसोई की खिड़की से उन्हें खेलता देखती । शायद उसे जलन होती थी या फिर वो अपना बचपन जीना चाहती थी जो छीन लिया गया था।
लेकिन आज ना जाने उसके मन से आवाज़ आ रही थी की वो अपना छूट चुका बचपन इन बाहर खेल रही लड़कियों के साथ दोबारा जी ले।
पर उसे डर था की घर वाले क्या कहेँगे, बहु बेटे देखेंगे तो क्या कहेँगे की अम्मा को देखे बुढ़ापे में 13 / 14 साल की बच्ची बनी पड़ी है ।
मोहल्ले वाले देखेंगे तो क्या कहेँगे की सविता चाची को क्या हो गया , इन बच्चियों को खेल से भगाने वाली आज खुद ही इनके साथ खेल रही है वो भी बुढ़ापे में
लेकिन उन्हें क्या पता की वो जब इस उम्र में थी तब ना चाहते हुए भी उसे बाल विवाह की अग्नि में झोक दिया था जिसमे उसका बचपन जल कर राख हो गया था ।
लेकिन अब उसे किसी का डर नही था पूरी ज़िन्दगी उसने डर डर कर गुज़ार दी थी पहले पिता का डर जिसकी वजह से उसे गोना करने पर मजबूर होना पड़ा , फिर पति का डर , घर में सास का डर और फिर बच्चों का डर ।
लेकिन अब नही इसलिए उसने रसोई की खिड़की को खोल दिया और दरवाज़े से बाहर आयी ।
उसे आता देख वहाँ मौजूद लड़कियां डरने लगी की चाची अब हमें यहाँ से भगा देंगी और हमें ये खेल अधूरा ही छोड़ना पड़ेगा ।
लेकिन शायद इस बार सविता चाची खुद उनके साथ खेलना चाहती थी तब ही तो डरे सहमे बच्चों के पास आकर उन्होंने सिर्फ इतना पूछा " क्या मैं तुम लोगो के साथ खेल सकती हूँ, जिस खेल से नाता मेरा बचपन में टूट गया था क्या मैं वो अब तुम्हारे साथ खेल सकती हूँ "
बच्चें चाची के मुँह से ये सुन हैरान थे , जो चाची अक्सर उन्हें रसोई की खिड़की से खेलता देख डाटती थी आज वही उनके पास उनके साथ खेलने को कह रही थी ।
उनमे से एक लड़की ने डरते डरते पूछा " चाची आप तो बड़ी हो, ये खेल कैसे खेल पाओगी आप को चोट लग जाएगी "
सविता ने कहा " बेटा मुझे चोट नही लगेगी एक बार खिला कर देखो "
चाची के मुँह से आज इस तरह की बात सुन वहाँ मौजूद बच्चें हैरान थे जो चाची हमेशा अपनी जुबान पर कड़वाहट लिए रहती थी आज वो बच्चों की तरह खेलने की ज़िद्द कर रही थी अब उन बच्चों को क्या पता की चाची के अतीत के पन्ने किस तरह की स्याही से लिखें गए थे जिनमे सिर्फ सबने उससे फायदा ही उठाया उसके दिल की कभी किसी ने सुनी नही। अगर एक बार उसकी भी कोई सुन लेता तो आज उसके मन में भी कड़वाहट ना होती।
सविता जी किसी की परवाह किए बिना ही उन बच्चियों के साथ खेल रही थी मानो आज इतने सालों बाद उनका बचपन लोट आया था ।
प्रतियोगिता हेतु लिखी कहानी
shweta soni
31-Aug-2022 09:56 AM
Behtarin rachana
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Punam verma
30-Aug-2022 08:52 PM
Very nice
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Ajay Tiwari
30-Aug-2022 09:46 AM
Very nice
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